भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल तलवार, बम और बंदूक की गूंज से नहीं लिखा गया। इस संघर्ष में कुछ आवाज़ें ऐसी भी थीं, जिन्होंने सब्र, सेवा और साहस को हथियार बनाया। ऐसी ही एक बुलंद आवाज़ थे खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें दुनिया सीमांत गांधी के नाम से जानती है। आज उनकी यौम-ए-पैदाइश पर देश उस इंसान को याद कर रहा है, जिसने हिंसा के गढ़ माने जाने वाले पठानों के बीच अहिंसा की मशाल जलाई।सीमांत प्रांत से उठी अहिंसा की पुकार 6 फ़रवरी 1890 को उत्तर -पश्चिम सीमांत प्रांत (आज का खैबर पख्तूनख्वा) में जन्मे गफ्फार खान ने बेहद कम उम्र में यह समझ लिया था कि गुलामी का जवाब नफ़रत नहीं, बल्कि इंसाफ और चेतना है। उस दौर में जब पठान समाज को अंग्रेज जंगी और उग्र बताकर बदनाम करते थे, गफ्फार खान ने उसी समाज को अनुशासन, सेवा और त्याग की मिसाल बना दिया।
खुदाई खिदमतगार-अहिंसा की पहली संगठित सेना
1929 में उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ (ईश्वर के सेवक) संगठन की स्थापना की। यह कोई आम संगठन नहीं था। यह दुनिया की पहली ऐसी अहिंसक स्वयंसेवी सेना थी, जो बिना हथियार के अत्याचारी सत्ता से टकरा रही थी। सदस्य लाल कुर्ती पहनते थे, इसलिए लाल कुर्ती दल कहलाए।हर स्वयंसेवक को शपथ दिलाई जाती थी- “मैं बदले की भावना नहीं रखूंगा, मार खाऊंगा पर मारूंगा नहीं।”शिक्षा, सफ़ाई, नशामुक्ति और सामाजिक सुधार इनके आंदोलन का हिस्सा थे। यह संगठन अंग्रेजों के लिए इसलिए खतरनाक था, क्योंकि यह डर से नहीं, चेतना से लड़ रहा था।
किस्सा ख्वानी बाज़ार: जब गोलियों के सामने खड़े रहे निहत्थे लोग
23 अप्रैल 1930-पेशावर का किस्सा ख्वानी बाज़ार हुआ। ब्रिटिश सेना ने निहत्थे खुदाई खिदमतगार कार्यकर्ताओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। सैकड़ों लोग शहीद हुए, लेकिन इतिहास गवाह है, एक भी स्वयंसेवक ने पत्थर तक नहीं उठाया। यह दृश्य अंग्रेज अफसरों के लिए भी चौंकाने वाला था। यह साबित हो गया कि अहिंसा कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है।
गांधी और गफ्फार: दो जिस्म, एक सोच
महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खान के रिश्ते राजनीति से कहीं आगे थे। यह रिश्ता विचारों का था। दोनों का विश्वास था कि सत्य से बड़ा कोई हथियार नहीं, नफ़रत से आज़ादी नहीं मिलती। इसी कारण गांधीजी उन्हें प्यार से “मेरा सीमांत का भाई” कहते थे। कांग्रेस अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन गफ्फार खान ने कहा- “मेरी राजनीति सेवा है, कुर्सी नहीं।”
विभाजन- एक ऐसा जख्म जो भर न सका
1947 में जब देश आज़ाद हुआ, उसी वक्त उसका बंटवारा भी हुआ।गफ्फार खान ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि धर्म के नाम पर बंटवारा इंसानियत की हार है। उन्होंने गांधीजी से कहा था- “आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया।” आजादी के बाद पाकिस्तान में रहकर उन्होंने पश्तूनों के अधिकारों की बात की, लेकिन इनाम मिला- जेल, नजरबंदी और देशद्रोह का तमगा।
27 साल की कैद, लेकिन सिद्धांतों की रिहाई
कुल मिलाकर गफ्फार खान ने करीब 27 साल जेलों और नजरबंदी में बिताए। ब्रिटिश हुकूमत में भी और आज़ादी के बाद भी, लेकिन उन्होंने कभी अहिंसा का रास्ता नहीं छोड़ा।उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सिद्धांतों की कैद नहीं होती।
भारत रत्न- सरहदों से ऊपर सम्मान
1987 में भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। वे यह सम्मान पाने वाले पहले गैर -भारतीय नागरिक बने। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस सोच को था, जो नफ़रत के दौर में इंसानियत की बात करती है। एक विरासत जो आज भी ज़िंदा है,1988 में उनका निधन हुआ।उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद में दफन किया गया, ऐसे समय में जब युद्ध चल रहा था, दोनों देशों ने उनके जनाज़े के लिए युद्धविराम किया। यह अपने आप में उनकी महानता का प्रमाण है।
अहिंसा कायरों का नहीं,साहसी लोगों का रास्ता
आज के दौर के लिए गफ्फार खान का पैग़ाम, आज जब दुनिया हिंसा, नफ़रत और ध्रुवीकरण से जूझ रही है,खान अब्दुल गफ्फार खान हमें याद दिलाते हैं कि अहिंसा कायरों का नहीं, साहसी लोगों का रास्ता है। उनकी यौम-ए-पैदाइश पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम सब्र को कमजोरी नहीं, हथियार समझें।
