British Raj के खिलाफ़ सबसे बुलंद आवाज़, हिंदू-मुस्लिम एकता के सच्चे पैरोकार
मौलाना शौकत अली सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक तहरीक थे। उन्होंने साबित किया कि असली आज़ादी सिर्फ़ अंग्रेज़ों से छुटकारा नहीं, बल्कि दिलों की एकता से मिलती है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र जब भी होता है, मौलाना शौकत अली (1873–1938) का नाम हमेशा इज़्ज़त से लिया जाता है। वो सिर्फ़ एक आज़ादी के सिपाही नहीं थे, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता के ऐसे दीवाने थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन कौमी एकता और आज़ादी के नाम कर दिया। इतिहास में दर्ज है कि एक वक़्त ऐसा भी आया, जब शौकत अली ने मुहम्मद अली जिन्ना पर ग़ुस्से में लाठी उठा ली थी। वजह साफ़ थी, वो किसी भी क़ीमत पर भारत के बंटवारे के हामी नहीं थे। उनके दिल में सिर्फ़ और सिर्फ़ एकता और आज़ादी की आग जल रही थी।
महात्मा गांधी ने कहा, शौकत ने हमेशा ठंडी हवा की बात की
देखें वीडियो 👇🏻
https://youtu.be/dLyJeoCMCkA?si=SJGtH_ec4kT7_PYF
महात्मा गांधी ने शौकत अली और उनके भाई मौलाना मोहम्मद अली जौहर के बारे में लिखा था कि “शौकत साहब हमेशा ‘ठंडी हवा’ की बात किया करते थे। उनकी ज़िन्दगी ने हमें सिखाया कि सच्ची ताक़त ग़ुस्से में नहीं, बल्कि शान्ति और एकता में है।”हालांकि, गांधी जी और अली ब्रदर्स का ताल्लुक़ सिर्फ़ सियासी नहीं था, बल्कि हिंदुस्तान की आज़ादी की जद्दोजहद का साझा मक़सद था।
कौमी एकता ही असली आज़ादी की गारंटी
शौकत अली ने अपने भाई मोहम्मद अली जौहर के साथ मिलकर ख़िलाफ़त आंदोलन (1919–1924) चलाया। इसका मक़सद तुर्की के खलीफ़ा को बचाना ही नहीं था, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करना भी था। उनका मानना था कि “कौमी एकता ही असली आज़ादी की गारंटी है।”
मुसलमान हिंदुस्तान का अलग हिस्सा नहीं, बल्कि उसका अटूट हिस्सा
नेहरू रिपोर्ट (1928) पर जब मुसलमानों की अलग चुनावी माँग का मुद्दा उठा, तब भी शौकत अली ने साफ़ कहा “मुसलमान हिंदुस्तान का अलग हिस्सा नहीं, बल्कि उसका अटूट हिस्सा हैं।”उनका इंतकाल 26 नवम्बर, 1938 को दिल्ली में उनका इंतिक़ाल हुआ। महात्मा गांधी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रिंसिपल डॉ. जाकिर हुसैन को टेलीग्राम भेजते हुए लिखा “हालाँकि हमारे बीच मतभेद थे, लेकिन वो हमेशा मेरे अज़ीज़ दोस्त रहे। उनकी मौत के बाद उम्मीद करता हूँ कि हिंदू और मुसलमान उनका सपना पूरा करेंगे।”
सरोजिनी नायडू, और नेहरू ने जताया अफसोस
सरोजिनी नायडू, और जवाहर लाल नेहरू ने मौलाना के इंतकाल (मृत्यु) पर अफसोस जताया था। सरोजनी नायडू ने कहा था “भारत ने मौलाना शौकत अली के रूप में एक जीवंत और विशिष्ट व्यक्ति खो दिया है। वो हमेशा मेरे लिए एक Comrade और साथी रहेंगे।”
