नई दिल्ली। Supreme Court of India ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में शामिल करने का निर्णय केवल उसके माता-पिता या अभिभावकों की सैलरी के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस तरह का निर्णय लेते समय माता-पिता के पद, उनकी सेवा की स्थिति और अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यह फैसला जस्टिस P. S. Narasimha और न्यायमूर्ति R. Mahadevan की खंडपीठ ने सुनाया। पीठ ने केंद्र सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया जो विभिन्न हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ दायर की गई थीं। इस फैसले से उन कई उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई थी।
दरअसल, सरकार ने कुछ उम्मीदवारों के माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर की श्रेणी में डाल दिया था। इसके चलते उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया और नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। प्रभावित उम्मीदवारों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अधिकारियों ने क्रीमी लेयर तय करने के लिए गलत मानदंड अपनाया।
न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने फैसले में कहा कि किसी भी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखने का निर्णय केवल आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद और उनकी सेवा की श्रेणी को भी देखा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी नीति के मूल प्रावधानों की अनदेखी कर केवल सैलरी को आधार बनाना गलत है।
यह विवाद मुख्य रूप से उन उम्मीदवारों से जुड़ा था जिनके माता-पिता सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों या इसी तरह के संस्थानों में काम करते थे। सरकार ने वर्ष 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र का हवाला देते हुए उनकी सैलरी को आय में जोड़ दिया था। इसके कारण उन्हें क्रीमी लेयर में डालकर आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 1993 के उस सरकारी आदेश का हवाला दिया जो Indra Sawhney case के बाद जारी किया गया था। इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता का पद महत्वपूर्ण आधार होगा। उदाहरण के तौर पर यदि माता-पिता ग्रुप-ए या ग्रुप-बी अधिकारी हैं तो उस आधार पर निर्णय लिया जाएगा। वहीं इस नियम के तहत सैलरी और खेती से होने वाली आय को आय/संपत्ति परीक्षण में शामिल नहीं किया जाता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 2004 का स्पष्टीकरण पत्र मूल नीति को बदलने का अधिकार नहीं रखता। यदि किसी नीति में बदलाव करना है तो उसके लिए उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों के बीच इस तरह का भेदभाव करना सही नहीं है।
पीठ ने कहा कि अगर सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर क्रीमी लेयर से छूट मिल सकती है, तो सार्वजनिक उपक्रमों या बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर आरक्षण से बाहर करना संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रभावित उम्मीदवारों के मामलों की छह महीने के भीतर दोबारा समीक्षा करे। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो तो इन उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के लिए अलग से पद भी बनाए जा सकते हैं।
