लेखक
रामगोविन्द चौधरी
पूर्व मंत्री/पूर्व नेता प्रतिपक्ष, उ.प्र.
राष्ट्रीय सचिव, समाजवादी पार्टी
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को एक साधारण मतदाता सूची संशोधन अभियान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन विपक्ष, नागरिक संगठनों और सामाजिक न्याय आंदोलनों में गहरी आशंका है कि यह प्रक्रिया सुधार नहीं, बल्कि ‘सिस्टमेटिक वोट कटिंग’ का आधुनिक तरीका बन रही है। जिस प्रकार दस्तावेज़ों की मांग की जा रही है, और जिस पैटर्न पर शिकायतें आ रही हैं। वह संकेत देता है कि निशाने पर वही समुदाय हैं जिन्हें सदियों से राजनीतिक रूप से कमजोर करने की कोशिश होती रही है, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत है, जब हर नागरिक की आवाज़ सुनी जाए, हर नागरिक को समान अधिकार मिले, और कोई भी सत्ता जनता से उसकी शक्ति- मताधिकार-न छीन सके। यदि SIR वोट काटने का औजार बनता है, तो यह न सिर्फ राजनीतिक अपराध होगा बल्कि संवैधानिक विश्वासघात भी होगा।
लोकतंत्र पर सीधा हमला-वोटर लिस्ट से नाम हटाना कैसे बनता है खतरनाक?
मतदान का अधिकार सिर्फ एक चुनावी औपचारिकता नहीं-यह हर नागरिक की राजनीतिक आवाज़, संवैधानिक शक्ति और सम्मान है। यदि वोटर सूची से लाखों नाम ‘प्रक्रिया’ के नाम पर गायब होने लगें, तो यह सिर्फ प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे खतरनाक क्षरण है। विपक्षी दलों का आरोप है कि SIR के ज़रिये संगठित ढंग से वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी कम करने की कोशिश हो रही है। कई राज्यों में, स्थानीय कार्यकर्ताओं ने पाया है कि ऐसे ही इलाकों में जांच अधिक आक्रामक है जहां दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि वोटिंग लिस्ट से बड़े पैमाने पर ये समुदाय बाहर होते हैं, तो इसका सीधा असर लोकतंत्र की दिशा और नतीजों पर पड़ेगा। यह सिर्फ वोट का सवाल नहीं,यह समानता और सामाजिक न्याय के विचार पर सीधा हमला है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज-विपक्ष ने दी चेतावनी, सड़क से सदन तक उठ रही आवाज़
सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि कई विपक्षी दल इस मुद्दे पर एक स्वर में चिंतित दिख रहे हैं। कांग्रेस नेता इसे “लोकतंत्र की अदृश्य हत्या” बता रहे हैं। समाजवादी पार्टी का कहना है कि कई विधानसभा क्षेत्रों में 50,000 तक वोट प्रभावित हो सकते हैं। तमिलनाडु सरकार ने SIR को “संदिग्ध प्रक्रिया” बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। आम आदमी पार्टी ने बूथ स्तर तक “अलर्ट-मोड” जारी कर दिया है, ताकि कोई भी वास्तविक वोटर सूची से बाहर न हो पाए। यह विरोध दर्शाता है कि सवाल सिर्फ तकनीकी नहीं-राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर बेहद गंभीर है।
वोटर पहचान पर हमला-सामाजिक न्याय पर हमला
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की गारंटी देता है, लेकिन इतिहास बताता है कि लोकतंत्र कमजोर तब होता है जब कमजोर वर्गों की राजनीतिक आवाज़ दबाई जाती है। यदि SIR जैसे अभियान को बिना पारदर्शिता और बिना स्वतंत्र निगरानी के चलाया गया, तो प्रतिनिधित्व कमजोर होगा, नीति निर्माण असंतुलित होगा। कमजोर तबके और ज़्यादा हाशिये पर चले जाएंगे।यह सिर्फ राजनीतिक सवाल नहीं।यह सामाजिक न्याय की आत्मा पर प्रहार है।
जनता को सीधी अपील-अपना वोट बचाइए, लोकतंत्र बचाइए
हम सभी प्रदेशवासियों से अपील करते हैं कि अपनी मतदाता सूची तुरंत जांचें। बूथ स्तर पर जाकर या ऑनलाइन यह देखें कि आपका और आपके परिवार का नाम दर्ज है या नहीं। गलतियाँ मिलें तो शिकायत दर्ज करें। यह आपका अधिकार है।संविधान से खिलवाड़ बंद हो! हमारा वोट- हमारी आवाज़-नहीं छिनेगी!
