उपचुनाव से पहले निर्वाचन आयोग का अंतरिम फैसला, ममता बनर्जी गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ और अरूप रॉय गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम मिला
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों के लिए अंतरिम व्यवस्था के तहत अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया गया है, जबकि अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम मिला है। यह फैसला पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर छह अक्तूबर को होने वाले उपचुनाव से पहले आया है।
ममता गुट को मिला फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिह्न
निर्वाचन आयोग के आदेश के मुताबिक, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को चुनाव चिह्न के रूप में फुटबॉल खिलाड़ी दिया गया है। वहीं अरूप रॉय गुट को लिफाफा चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। इससे पहले आयोग ने दोनों पक्षों को आगामी उपचुनाव में मूल अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस नाम और पार्टी के पारंपरिक जोड़ा घास फूल चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने से रोक दिया था।
दोनों गुटों को नए नाम और चिह्न चुनने का निर्देश
निर्वाचन आयोग ने गुरुवार रात अंतरिम आदेश जारी कर दोनों पक्षों से अपनी पसंद के अस्थायी नाम और चुनाव चिह्न बताने को कहा था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि दोनों गुट ऐसे नाम रख सकते हैं, जो मूल पार्टी के नाम से मिलते-जुलते हों। हालांकि, चुनाव चिह्न ऐसे होने चाहिए, जो निर्दलीय उम्मीदवारों और पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए उपलब्ध सूची में शामिल हों।
किन दो सीटों पर होगा उपचुनाव?
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर छह अक्तूबर को उपचुनाव होना है। नंदीग्राम पूर्व मेदिनीपुर जिले में और रेजीनगर मुर्शिदाबाद जिले में है। दोनों सीटों के लिए मतदान के बाद नौ अक्तूबर को मतगणना होगी। उपचुनाव को देखते हुए दोनों गुटों के लिए नाम और चुनाव चिह्न को लेकर निर्वाचन आयोग का अंतरिम फैसला तत्काल प्रभाव से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ममता गुट ने सुझाए थे तीन नाम और चुनाव चिह्न
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने निर्वाचन आयोग के सामने तीन नाम प्रस्तावित किए थे। इनमें अखिल भारतीय तृणमूल ममता कांग्रेस, अखिल भारतीय ममता तृणमूल कांग्रेस और ममता तृणमूल कांग्रेस शामिल थे। चुनाव चिह्न के लिए क्रिकेट बैट और बिना गेंद वाले फुटबॉल खिलाड़ी का विकल्प भी सुझाया गया था। आयोग ने इनमें से फुटबॉल खिलाड़ी के चिह्न को मंजूरी दी।
निर्वाचन आयोग ने अंतरिम व्यवस्था क्यों की?
आयोग ने कहा कि उपचुनाव के लिए पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न की तत्काल जरूरत थी, जबकि चुनाव चिह्न संबंधी आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत दोनों गुटों के विवाद पर पूरी प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं था। इसी वजह से आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था की है। यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम फैसला नहीं हो जाता।
तृणमूल कांग्रेस में विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
निर्वाचन आयोग का यह फैसला तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे राजनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि में आया है। मई में विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के विधायक दल में विद्रोह की स्थिति बनी थी। बाद में विवाद संसद तक भी पहुंचा। जून में 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना था। उन्होंने ममता गुट के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय की जगह बनर्जी को चुना और विधानसभा अध्यक्ष ने भी उन्हें मान्यता दी।
दोनों गुटों को दिए गए थे ये निर्देश
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता वाले निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों को तीन-तीन पसंदीदा अस्थायी नाम और मुफ्त चुनाव चिह्नों की सूची से तीन-तीन विकल्प देने का निर्देश दिया था। आयोग के अंतरिम आदेश में कहा गया कि दोनों गुट अपने अस्थायी नाम में मूल पार्टी से जुड़ा कोई शब्द या पहचान रखने का विकल्प चुन सकते हैं। आयोग के मुताबिक, यह व्यवस्था दोनों पक्षों को समान अवसर देने और उनके अधिकारों एवं हितों की रक्षा के लिए की गई है। फिलहाल यह नाम और चुनाव चिह्न आगामी उपचुनावों के लिए अंतरिम तौर पर लागू होंगे। दोनों गुटों के विवाद पर अंतिम फैसला आने के बाद स्थिति में बदलाव हो सकता है।
